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Samveda/899

परिष्कृण्वन्ननिष्कृतं जनाय यातयन्निषः। पृष्टिं दिवः परि स्रव॥८९९

Veda : Samveda | Mantra No : 899

In Hindi:

ऋषि : बृहन्मतिराङ्गिरसः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अब परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं।

पदपाठ : परिष्कृण्वन् ।परि ।कृण्वन् ।अनिष्कृतम् ।अ ।निष्कृतम् ।जनाय ।यातयन् ।इषः ।वृष्टिम् ।दिवः ।परि ।स्रव॥

पदार्थ : हे पवमान सोम अर्थात् पवित्रतादायक रसागार परमेश्वर ! आप (अनिष्कृतम्) अपरिष्कृत हृदय को (परिष्कृण्वन्) परिष्कृत करते हुए और (जनाय) उपासक मनुष्य के लिए (इषः) आक्रमणकारी विघ्नों की (यातयन्) हिंसा करते हुए (दिवः) आनन्दमय कोश से (वृष्टिम्) आनन्दरस की वर्षा (परि स्रव) प्रवाहित कीजिए ॥२॥

भावार्थ : जैसे बादल से वर्षा होने पर सूखी भूमि सरस हो जाती है, वैसे ही सबके आत्मा में स्थित परमात्मा के पास से आनन्दरस की वर्षा होने पर आत्मा, मन, बुद्धि आदि सब सरस और सप्राण हो जाते हैं ॥२॥