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Samveda/914

इच्छन्नश्वस्य यच्छिरः पर्वतेष्वपश्रितम्। तद्विदच्छर्यणावति॥९१४

Veda : Samveda | Mantra No : 914

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में पुनः जगदीश्वर का कर्म वर्णित है।

पदपाठ : इच्छन् ।अश्वस्य ।यत् ।शिरः ।पर्वतेषु ।अपश्रितम् ।अप ।श्रितम् ।तत् ।विदत् ।शर्यणावति॥

पदार्थ : इन्द्र जगदीश्वर (अश्वस्य) अन्तरिक्ष में व्याप्त बादल के (पर्वतेषु) पहाड़ों पर (अपश्रितम्) गिरे हुए (यत्) जिस (शिरः) जीर्ण-शीर्ण जल को (इच्छन्) फिर से भाप बनाना चाहता है (तत्) उस जल को वह (शर्यणावति)नदियों से युक्त समुद्र में (विदत्) पा लेता है। अभिप्राय यह है कि जो बादल का जल भूमि पर बरस कर नदियों द्वारा समुद्र में चला जाता है, उसे फिर वह सूर्य द्वारा भाप बनाकर अन्तरिक्ष में ले जाकर बादल के रूप में परिणत कर देता है ॥२॥

भावार्थ : बादल से वर्षा और बरसे हुए जल से फिर बादल का निर्माण इस चक्र को जगदीश्वर ही चला रहा है। यदि ऐसी उसकी की हुई सुव्यवस्था न होती तो यह भूमण्डल शुष्क एवं वृक्ष-ओषधि-लता आदि से विहीन हो जाता ॥२॥इस मन्त्र पर सायणाचार्य द्वारा प्रोक्त इतिहास एवं उसका प्रत्याख्यान पूर्वार्चिक मन्त्र क्रमाङ्क १७९ के भाष्य में देखना चाहिए ॥