Samveda/935
परि प्रिया दिवः कविर्वयासि नप्त्योर्हितः। स्वानैर्याति कविक्रतुः॥९३५
Veda : Samveda | Mantra No : 935
In English:
Seer : asitaH kaashyapo devalo vaa | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : gaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : pari priyaa diva kavirvayaa.m si naptyorhitaH . svaanairyaati kavikratuH.935
Component Words : pari .priyaa .divaH .kaviH. vayaasi .naptyoH .hitaH .svaanaiH .yaati .kavikratuH .kavi .kratuH.
In Hindi:
ऋषि : असितः काश्यपो देवलो वा | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ४७६ क्रमाङ्क पर परमात्मा के आनन्दरस के विषय में व्याख्यात हुई थी। यहाँ गुरु-शिष्य का विषय वर्णित है।
पदपाठ : परि ।प्रिया ।दिवः ।कविः। वयासि ।नप्त्योः ।हितः ।स्वानैः ।याति ।कविक्रतुः ।कवि ।क्रतुः॥
पदार्थ : शिष्यों के (नप्त्योः) आत्मा और मन का (हितः) हित करनेवाला, (कविक्रतुः) मेधावान् और सदाचारी आचार्य (दिवः) यश से प्रकाशित गुरुकुल के (प्रिया वयांसि) प्रिय शिष्यों को (स्वानैः) शास्त्रोपदेश के शब्दों के साथ (परियाति) प्राप्त होता है ॥१॥
भावार्थ : जो स्वयं विद्वान् सदाचारी और पढ़ाने में चतुर है, वही आचार्य शिष्यों को सुयोग्य बना सकता है ॥१॥
In Sanskrit:
ऋषि : असितः काश्यपो देवलो वा | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : तत्र प्रथमा ऋक् पूर्वार्चिके ४७६ क्रमाङ्के परमात्मन आनन्दरसविषये व्याख्याता। अत्र गुरुशिष्यविषयो वर्ण्यते।
पदपाठ : परि ।प्रिया ।दिवः ।कविः। वयासि ।नप्त्योः ।हितः ।स्वानैः ।याति ।कविक्रतुः ।कवि ।क्रतुः॥
पदार्थ : शिष्याणाम् (नप्त्योः) आत्ममनसोः (हितः) हितकरः, (कविक्रतुः) मेधावी सत्कर्मा च आचार्यः (दिवः) यशसा प्रकाशितस्य गुरुकुलस्य (प्रिया वयांसि) प्रियान् शिष्यान् (स्वानैः) शास्त्रोपदेशकर्तृभिः शब्दैः सह (परियाति) परि प्राप्नोति ॥१॥
भावार्थ : यः स्वयं विद्वान् सदाचारवान् अध्यापनकुशलश्चास्ति स एवाचार्यः शिष्यान् सुयोग्यान् कर्तुं प्रभवति ॥१॥
टिप्पणी:१. ऋ० ९।९।१, ‘सु॒वा॒नो या॑ति’ इति पाठः। साम० ४७६, (ऋषिः) काश्यपोऽसितः।