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Samveda/953

इन्द्र जठरं नव्यं न पृणस्व मधोर्दिवो न। अस्य सुतस्य स्वाउर्नोप त्वा मदाः सुवाचो अस्थुः॥९५३

Veda : Samveda | Mantra No : 953

In Hindi:

ऋषि : पावकोऽग्निर्बार्हस्पत्यो वा, गृहपतियविष्ठौ सहसः पुत्रावन्यतरो वा | देवता : इन्द्रः | छन्द : तृचात्मक सूक्तम् | स्वर : मध्यमः

विषय : अगले मन्त्र में पुनः जीवात्मा का ही विषय है।

पदपाठ : इन्द्र । जठरम् । नव्यम् ।न ।पृणस्व ।मधोः ।दिवः।न ।अस्य ।सुतस्य ।स्वः ।न ।उप ।त्वा ।मदाः ।सुवाचः ।सु ।वाचः ।अस्थुः॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) जीवात्मन् ! (दिवः न मधोः) अन्तरिक्ष से प्राप्त मधुर वृष्टिजल के समान मधुर ब्रह्मानन्दरस के अंश से, तू (नव्यं न) नवीनसदृश (जठरम्) अपने उदर को अर्थात् स्वयं को (पृणस्व) तृप्त कर। (स्वः न) सूर्य के सदृश जगदीश्वर के पास से (सुतस्य) अभिषुत (अस्य) इस ब्रह्मानन्दरस की (सुवाचः) शुभ स्तुति-वाणियों को प्रेरित करनेवाली (मदाः) तृप्तियाँ (त्वा उप अस्थुः) तेरे सम्मुख उपस्थित हों ॥२॥यहाँ उपमालङ्कार है। ‘नव्यं न’ में उत्प्रेक्षा है, नित्य पुरातन भी आत्मा नवीन शरीर को धारण कर मानो नवीन हो जाता है ॥

भावार्थ : मनुष्य का आत्मा ब्रह्मानन्द-रस से तृप्त होकर स्वयं सुख-शान्ति प्राप्त करके दूसरों को भी प्रदान करे ॥२॥