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Samveda/957

ईशान इमा भुवनानि ईयसे युजान इन्दो हरितः सुपकण्यः। तास्ते क्षरन्तु मधुमद्घृतं पयस्तव व्रते सोम तिष्ठन्तु कृष्टयः (खी)।। [धा. । उ । स्व. ।]॥९५७

Veda : Samveda | Mantra No : 957

In Hindi:

ऋषि : त्रयः ऋषयः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : आगे पुनः वही विषय है।

पदपाठ : ईशानः ।इमा। भुवनानि ।ईयसे ।युञ्जानः ।इन्दो ।हरितः ।सुपर्ण्व ।सु ।पर्ण्यः ।ताः ।ते। क्षरन्तु ।मधुमत् ।घृतम् ।पवः।तव। व्रते ।सोम ।तिष्ठन्तु। कृष्टयः॥

पदार्थ : हे (इन्दो) तेजस्विन्, चन्द्रमा के समान आह्लाददायक परमात्मन् ! आप (इमा भुवनानि) इन लोकों के (ईशानः) अधिष्ठाता होते हुए (ईयसे) व्याप्त हो। आप (सुपर्ण्यः हरितः) तीव्र गतिवाली सूर्यकिरणों को (युजानः) भूमि, चन्द्रमा आदि ग्रहोपग्रहों में जोड़ते हुए (ईयसे) व्याप्त होते हो। (ते) आपकी (ताः) वे सूर्य-किरणें (मधुमत्) मधुर, (घृतम्) प्रवाहशील(पयः) वर्षाजल को (क्षरन्तु) बरसायें। हे (सोम)शुभगुणप्रेरक परमात्मन् ! (तव व्रते) आपके उपदेश किये हुए कर्म में (कृष्टयः) प्रजाएँ (तिष्ठन्तु) स्थित रहें ॥३॥

भावार्थ : जो परमेश्वर सब जगत् को उत्पन्न करके उसकी भली-भाँति व्यवस्था करता है, जो मेघों में जल निहित करता तथा बरसाता है, उसके बताये व्रतों का पालन करते हुए सब लोग सुखी हों ॥३॥