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Samveda/966

पवस्व वृत्रहन्तम उक्थेभिरनुमाद्यः। शुचिः पावको अद्भुतः॥९६६

Veda : Samveda | Mantra No : 966

In Hindi:

ऋषि : असितः काश्यपो देवलो वा | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में पुनः परमात्मा से प्रार्थना करते हैं।

पदपाठ : पवस्व ।वृत्रहन्तमः ।वृत्र ।हन्तमः ।उक्थेभिः ।अनुमाद्यः ।अनु ।माद्यः ।शुचिः ।पावकः ।अद्भुतः ।अत्। भुत्॥

पदार्थ : हे सोम ! हे रसागार, परमाह्लादक, जगदाधार परमेश्वर ! (वृत्रहन्तमः) पापों को अतिशय नष्ट करनेवाले, (उक्थेभिः) स्तोत्रों से (अनुमाद्यः) प्रसन्न करने योग्य, (शुचिः) पवित्र, (पावकः) पवित्र करनेवाले, (अद्भुतः) आश्चर्यकारी गुण-कर्म-स्वभाववाले आप, हम उपासकों को (पवस्व) पवित्र कीजिए ॥६॥

भावार्थ : जो स्वयं पापों का सबसे बढ़कर विनाशक, पवित्र और अद्भुत है, वह अन्यों को भी निष्पाप, पवित्र अन्तःकरणवाला और अद्भुत क्यों न करे ? ॥६॥