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Samveda/1019

इन्दुर्वाजी पवते गोन्योघा इन्द्रे सोमः सह इन्वन्मदाय। हन्ति रक्षो बाधते पर्यरातिं वरिवस्कृण्वन्वृजनस्य राजा॥१०१९

Veda : Samveda | Mantra No : 1019

In Hindi:

ऋषि : मन्युर्वासिष्ठः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : प्रथम ऋचा की पूर्वार्चिक में ५४० क्रमाङ्क पर परमात्मा के विषय में व्याख्या हो चुकी है। यहाँ ब्रह्मानन्द रस का वर्णन है।

पदपाठ : इन्दुः ।वाजी ।पवते ।गोन्योधाः ।गो ।न्योघाः ।इन्द्रे ।सोमः ।सहः ।इन्वम् ।मदाय ।हन्ति ।रक्षः ।बाधते। परि ।अरातिम् ।अ। रातिम् ।वरिवः। कृण्वन् ।वृजनस्व ।राजा॥

पदार्थ : (गोन्योधाः) मन, बुद्धि, प्राण एवं इन्द्रियों में प्रवाहित होनेवाला, (वाजी) वेगवान्, (इन्दुः) सराबोर करनेवाला ब्रह्मानन्दरस (पवते) प्रवाहित हो रहा है। (सोमः) अभिषुत वह ब्रह्मानन्दरस (इन्द्रे) जीवात्मा में (मदाय) उत्साह के लिए (सहः) बल (इन्वन्) प्रेरित करता है। वह रस (रक्षः) पाप को (हन्ति) विनष्ट करता है, (अरातिम्) आदानवृत्ति को (परिबाधते) दूर करता है। (वृजनस्य) आत्मिक बल का (राजा) राजा वह (वरिवः) आध्यात्मिक धन को (कृण्वन्) उत्पन्न करता है ॥१॥

भावार्थ : योगाभ्यास द्वारा आनन्दरस की नदी जीवात्मप्रदेश में जब बहती है, तब सब दोष दूर हो जाते हैं और चित्त निर्मल हो जाता है ॥१॥