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Samveda/1043

गिरस्त इन्द ओजसा मर्मृज्यन्ते अपस्युवः। याभिर्मदाय शुम्भसे॥१०४३

Veda : Samveda | Mantra No : 1043

In Hindi:

ऋषि : मेधातिथिः काण्वः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में उपासक को सम्बोधन किया गया है।

पदपाठ : गिरः ।ते ।इन्दो ।ओजसा ।मर्मृज्यन्ते ।अपस्युवः ।याभिः ।मदाय ।शुम्भसे॥

पदार्थ : हे (इन्दो) परमेश्वर के उपासक मानव ! (ते) तेरी (अपस्युवः) कर्म की कामनावाली (गिरः) वाणियाँ तुझे (ओजसा) तेज से (मर्मृज्यन्ते) अधिकाधिक बार-बार अलङ्कृत करती हैं, (याभिः) जिनसे तू (मदाय) आनन्द-प्राप्ति के लिए (शुम्भसे) शोभित होता है ॥४॥

भावार्थ : वाणी कर्म के साथ ही मनुष्य का भूषण होती है, कर्म के बिना नहीं ॥७॥