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Samveda/1048

सना ज्योतिः सना स्वाऽविश्वा च सोम सौभगा। अथा नो वस्यसस्कृधि॥१०४८

Veda : Samveda | Mantra No : 1048

In Hindi:

ऋषि : हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : आगे पुनः जीवात्मा को उद्बोधन है।

पदपाठ : सन ।स्वः ।विश्वा ।च ।सोम ।सौभगा। सौ। भगा ।अथ। नः ।वस्यसः ।कृधि॥

पदार्थ : हे (सोम) अग्रेगामी जीवात्मन् ! तू (ज्योतिः) दिव्य प्रकाश को (सन) प्राप्त कर, (स्वः) ब्रह्मानन्द को (सन) प्राप्त कर, (विश्वा च) और सब (सौभगा) सौभाग्यों को (सन) प्राप्त कर। (अथ) और उसके अनन्तर (नः) हमें भी (वस्यसः) अतिशय ऐश्वर्यवान् (कृधि) कर ॥२॥

भावार्थ : जीवात्मा ने सबसे उत्कृष्ट मानव-शरीर सब प्रकार की उन्नति करने के लिए प्राप्त किया है। इसलिए उसे चाहिए कि आध्यात्मिक और भौतिक सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष प्राप्त करे ॥२॥