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Samveda/1050

पवीतारः पुनीतन सोममिन्द्राय पातवे। अथा नो वस्यसस्कृधि॥१०५०

Veda : Samveda | Mantra No : 1050

In Hindi:

ऋषि : हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अब मनुष्यों को प्रेरित करते हैं।

पदपाठ : पवीतारः ।पुनीतन ।पुनीत ।न ।सोमम् ।इन्द्राय ।पातवे ।अथ ।नः ।वस्यसः ।कृधि॥

पदार्थ : हे (पवीतारः) पवित्रता के कार्य में संलग्न मनुष्यो ! तुम (इन्द्राय पातवे) जीवात्मा के पान के लिए (सोमम्) ज्ञान, कर्म, उपासना के रस को (पुनीतन) पवित्र करो। (अथ) और उसके अनन्तर, हे पवित्र ज्ञान, कर्म, उपासनावाले मानव। तू (नः) हमें भी (वस्यसः) अतिशय ऐश्वर्यवान् (कृधि) कर ॥४॥

भावार्थ : जिनके ज्ञान, कर्म और उपासना पवित्र होते हैं, उनकी सङ्गति से दूसरे लोग भी पवित्र अन्तःकरणवाले तथा ऐश्वर्यवान् हो जाते हैं ॥४॥