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Samveda/1057

तरत्स मन्दी धावति धारा सुतस्यान्धसः। तरत्स मन्दी धावति॥१०५७

Veda : Samveda | Mantra No : 1057

In Hindi:

ऋषि : अवत्सारः काश्यपः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ५०० क्रमाङ्क पर ऐहिक एवं पारलौकिक उत्कर्ष के विषय में व्याख्यात हुई थी। यहाँ मोक्ष-प्राप्ति का विषय वर्णित किया जाता है।

पदपाठ : तरत् ।सः ।मन्दी ।धावति ।धारा ।सुतस्थ ।अन्धसः ।तरत। सः ।मन्दी ।धावति॥

पदार्थ : (सः) वह (मन्दी) स्तुतिकर्ता मनुष्य (सुतस्य) परमेश्वर के पास से परिस्रुत होकर आये हुए (अन्धसः) ब्रह्मानन्दरूप सोमरस की (धारा) धारा से (धावति) अन्तरात्मा को धो लेता है और (तरत्) दुःखसागर को तर जाता है। सचमुच, (मन्दी सः) मुदित हुआ वह (धावति) लक्ष्य के प्रति दौड़ लगाता है और (तरत्) ब्रह्मानन्द-सागर में तैरता रहता है ॥१॥यहाँ प्रथम चरण की तृतीय चरण में आवृत्ति होने पर पादावृत्ति यमक अलङ्कार है ॥१॥

भावार्थ : परमेश्वर के ध्यान में जो लोग मग्न हो जाते हैं, वे उसके पास से बहती हुई आनन्द की तरङ्गिणी से धोये जाकर निर्मलात्मा होते हुए त्रिविध दुःखों से छूटकर मुक्त हो जाते हैं ॥१॥