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Samveda/1112

आदित्यैउिन्द्रः सगणो मरुद्भिरस्मभ्यं भेषजा करत् (छा)।। [धा. । उ । स्व. ।]॥१११२

Veda : Samveda | Mantra No : 1112

In Hindi:

ऋषि : भुवन आप्तयः साधनो वा भौवनः | देवता : विश्वेदेवाः | छन्द : द्विपदा त्रिष्टुप | स्वर : धैवतः

विषय : आगे फिर उसी विषय में कहा गया है।

पदपाठ : आदित्यैः ।आ। दित्यै ।इन्द्रः ।सगणः। स ।गणः ।मरुद्भिः ।अस्मभ्यम् ।भेषजा ।करत्॥

पदार्थ : (इन्द्रः) जीवात्मा (आदित्यैः) मन-बुद्धिसहित ज्ञानेन्द्रियों और (मरुद्भिः) प्राणों के (सगणः) गण से युक्त होकर, अथवा (इन्द्रः) राजा (आदित्यैः) सूर्यसम प्रकाशक ब्राह्मणों और (मरुद्भिः) योद्धा सैनिकों के (सगणः) गण से युक्त होकर (अस्मभ्यम्) हम मनुष्यों के लिए (भेषजा) औषध (करत्) करे ॥३॥यहाँ श्लेषालङ्कार है ॥३॥

भावार्थ : मनुष्य के शरीर वा राष्ट्र में जो कुछ भी कष्ट होता है,उसका शरीर में स्थित जीवात्मा, मन, बुद्धि, प्राण आदि वा राष्ट्र में स्थित राज्याधिकारी ब्राह्मण और वीर सैनिक युक्ति से प्रतीकार करें ॥३॥