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Samveda/1117

प्र हसासस्तृपला वग्नुमच्छामादस्तं वृषगणा अयासुः । आङ्गोषिणं पवमान सखायो दुर्मर्षं वाणं प्र वदन्ति साकम्॥१११७

Veda : Samveda | Mantra No : 1117

In Hindi:

ऋषि : वृषगणो वासिष्ठः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : कैसे शिष्य कैसे आचार्य के पास विद्या पढ़ने के लिए जाते हैं, यह अगले मन्त्र में कहा गया है।

पदपाठ : प्र ।हसासः ।तृपला। वग्नुम् ।अच्छ ।अमात् ।अस्तम् ।वृषगणाः ।वृष ।गणाः ।अयासुः ।अङ्गोषिणम् ।पवमानाम्। सखायः ।स ।खाय ।दुर्मर्षम् ।दुः ।मर्षम्। वाणम् ।प्र। वदन्ति ।साकम्॥

पदार्थ : (तृपला) शीघ्रकारी, (वृषगणाः) धार्मिक गणवाले, (हंसासः) हंसों के समान नीरक्षीर विवेकी, निर्मल हृदयवाले छात्र (अमात्) विद्याबल प्राप्त करने के हेतु से (वग्नुम् अच्छ) वाचस्पति आचार्य के प्रति (अस्तम्) गुरुकुलरूप घर में (अयासुः) जाते हैं। (सखाय) सहाध्यायी वे (साकम्) एक साथ मिलकर (अङ्गोषिणम्) वेदों का आघोष करनेवाले, (पवमानम्) ह्रदयों को पवित्र करनेवाले, (दुर्मर्षम्) दुर्धर्ष, (वाणम्) सेवनीय आचार्य को (प्रवदन्ति) पढ़ाने के लिए निवेदन करते हैं ॥२॥यहाँ ‘हंसासः’ में लुप्तोपमा है। वाणीवाचक ‘वग्नु’ शब्द लक्षणावृत्ति से ‘वाचस्पति’ अर्थ को लक्षित करता है, जिसमें वाणी पर अधिकार का अतिशय व्यङ्ग्य है ॥२॥

भावार्थ : सुयोग्य गुरुजन सुयोग्य शिष्यों को जब पा लेते हैं,तभी दोनों यशस्वी होते हैं ॥२॥