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Samveda/1128

असृग्रमिन्दवः पथा धर्मन्नृतस्य सुश्रियः। विदाना अस्य योजना॥११२८

Veda : Samveda | Mantra No : 1128

In Hindi:

ऋषि : असितः काश्यपो देवलो वा | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : प्रथम मन्त्र में विद्वानों का विषय वर्णित है।

पदपाठ : असृग्रम् ।इन्दवः ।पथा ।धर्मन् ।ऋतस्य ।सुश्रिवः ।सु ।श्रिवः ।विदानाः ।अस्य ।योजना॥

पदार्थ : (सुश्रियः) उत्तम श्रीवाले, (इन्दवः) तेजस्वी, ज्ञानरस से भिगोनेवाले विद्वान् गुरु लोग (ऋतस्य पथा) सत्य के मार्ग से (धर्मन्) धर्म में (असृग्रम्) तत्पर होते हैं, क्योंकि वे (अस्य) इस धर्ममार्ग की (योजना)क्रियान्वयन-पद्धतियों को (विदानाः) जानते हैं ॥१॥

भावार्थ : विद्वान् लोग स्वयं भी सत्य और धर्म के मार्ग में चलें तथा योजनाएँ बनाकर दूसरों को भी उस मार्ग पर चलाएँ ॥१॥