Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1150

य इद्ध आविवासति सुम्नमिन्द्रस्य मर्त्यः। द्युम्नाय सुतरा अपः॥११५०

Veda : Samveda | Mantra No : 1150

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में यह कहा गया है कि अग्नि में परमेश्वर की ही दी हुई ज्योति है।

पदपाठ : यः ।इद्धे। आविवासति ।आ ।विवासति ।सुम्नम्। इन्द्रस्य ।मर्त्त्यः ।द्युम्नाय ।सुतराः ।सु ।तराः। अपः॥

पदार्थ : (यः मर्त्यः) जो मनुष्य (इद्धे) अग्नि के प्रदीप्त होने पर (इन्द्रस्य) परमात्मा के (सुम्नम्) सुखदायक दान की (आ विवासति) प्रशंसा करता है, वह (द्युम्नाय) तेज और यश के लिए (अपः) विकट भी कर्मों को (सुतराः) आसानी से सिद्ध होनेवाला कर लेता है ॥२॥

भावार्थ : प्रज्वलित अग्नि में उसकी अपनी ज्योति नहीं है, प्रत्युत परमात्मा की ही है, ऐसा जो मानता है, वह परमात्मा का आराधक होता हुआ तेजस्वी और यशस्वी बनता है। पर जो भौतिकवादी होता है, वह भौतिक पदार्थों में ही रमता हुआ भोगों से ही भोगा जाता है ॥२॥