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Samveda/1155

न किष्टं कर्मणा नशद्यश्चकार सदावृधम्। इन्द्रं न यज्ञैर्विश्वगूर्त्तमृभ्वसमधृष्टं धृष्णुमोजसा॥११५५

Veda : Samveda | Mantra No : 1155

In Hindi:

ऋषि : पुरुहन्मा आङ्गिरसः | देवता : इन्द्रः | छन्द : प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) | स्वर : मध्यमः

विषय : प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में २४३ क्रमाङ्क पर परमेश्वर के महत्त्व के विषय में की गयी थी। यहाँ फिर वही विषय प्रदर्शित किया जा रहा है।

पदपाठ : न ।किः ।तम् ।कृमणा ।नशत्। यः ।चकार ।सदावृधम् ।सदा ।वृधम् ।इन्द्रम् ।न ।यज्ञैः ।विश्वगूर्तम् ।विश्व ।गूर्तम् ।ऋभ्वसम् ।अधृष्टम्। अ ।धृष्टम् ।धृष्णुम् ।ओजसा॥

पदार्थ : (तम्) उस प्रसिद्ध (इन्द्रम्) जगदीश्वर को (कर्मणा) कर्म से (न किः) कोई नहीं (नशन्) प्राप्त कर सकता है, अर्थात् कोई भी उसकी कर्म में बराबरी नहीं कर सकता है, (यः) जिस जगदीश्वर ने (सदावृधम्) सदा बढ़ते रहनेवाले इस ब्रह्माण्ड को (चकार) उत्पन्न किया है। (न) न ही (विश्वगूर्तम्) सर्वोन्नत, (ऋभ्वसम्) अत्यधिक भासमान, (अधृष्टम्) अपराजित, (ओजसा) प्रताप से (धृष्णुम्) दूसरों को पराजित करनेवाले उस जगदीश्वर की (यज्ञैः) जगत् के उत्पादन, धारण, पालन आदि यज्ञों में (नशत्) कोई बराबरी कर सकता है ॥१॥

भावार्थ : परमात्मा के तुल्य कर्म करनेवाला और परमात्मा के तुल्य यज्ञ करनेवाला संसार में न कोई हुआ है, न है, न भविष्य में होगा ॥१॥