Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1160

प्र वाज्यक्षाः सहस्रधारस्तिरः पवित्रं वि वारमव्यम्॥११६०

Veda : Samveda | Mantra No : 1160

In Hindi:

ऋषि : अग्नये धिष्ण्यो ऐश्वराः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : द्विपदा विराट् | स्वर : पञ्चमः

विषय : प्रथम मन्त्र में ज्ञानरस का विषय कहा जा रहा है।

पदपाठ : प्र ।वाजी ।अक्षारिति ।सहस्रधारः। सहस्र। धारः। तिरः ।पवित्रम ।वि ।वारम् ।अव्यम्॥

पदार्थ : (वाजी) बलवान् (सहस्रधारः) अनन्त धाराओंवाला पवमान सोम अर्थात् पवित्र करनेवाला ज्ञानरस(पवित्रम्) पवित्र मन को (तिरः) पार करके (अव्यम्) अविनश्वर (वारम्) दोषनिवारक जीवात्मा के प्रति (प्र वि अक्षाः) उत्तम प्रकार से विविधरूप में क्षरित हो रहा है ॥१॥

भावार्थ : आचार्य से प्रवाहित होता हुआ विज्ञानरस मन के माध्यम से जीवात्मा में प्रविष्ट होकर उसे पवित्र और विद्वान् बना देता है ॥१॥