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Samveda/1192

ते नः सहस्रिण रयिं पवन्तामा सुवीर्यम्। स्वाना देवास इन्दवः॥११९२

Veda : Samveda | Mantra No : 1192

In Hindi:

ऋषि : असितः काश्यपो देवलो वा | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : आनन्दरस क्या करें, यह अगले मन्त्र में कहा गया है।

पदपाठ : ते ।नः ।सहस्रिणम्। रयिम् ।पवन्ताम् ।आ। सुवीर्यम्। सु ।वीर्यम् ।स्वानाः ।देवासः ।इन्दवः॥

पदार्थ : (ते) वे पूर्वोक्त (स्वानाः) अभिषुत किये जाते हुए, (देवासः) स्वयं तेजस्वी तथा दूसरों को तेजस्वी बनानेवाले, (इन्दवः) रस से भिगोनेवाले सोम अर्थात् परमानन्द-रस (नः) हमारे लिए (सहस्रिणम्) सहस्रसंख्यक, (सुवीर्यम्) सुवीर्ययुक्त (रयिम्) अहिंसा, सत्य, भूतदया, माधुर्य, न्याय, उदारता आदि धन को (आ पवन्ताम्) लायें ॥६॥

भावार्थ : परमात्मा की उपासना से मिले हुए परमानन्द अनन्त दिव्यगुणसम्पदा को प्राप्त कराते हैं ॥६॥