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Samveda/1207

अव्या वारैः परि प्रिय हरि हिन्वन्त्यद्रिभिः। पवमानं मधुश्चुतम्॥१२०७

Veda : Samveda | Mantra No : 1207

In Hindi:

ऋषि : उचथ्यः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में यह कथन है कि कैसे परमेश्वर का किस प्रकार साक्षात्कार करना चाहिए।

पदपाठ : अव्याः ।वारै ।परि ।प्रियम् ।हरिम् ।हिन्वन्ति ।अद्रिभिः ।अ ।द्रिभिः ।पवमानम् ।मधुश्चुतम् ।मधु ।श्चतुम्॥

पदार्थ : (प्रियम्) उपासकों के प्यारे, (हरिम्) दुःखों को हरनेवाले, (पवमानम्) हृदय को पवित्र करनेवाले, (मधुश्चुतम्) आनन्द को परिस्रुत करनेवाले सोम परमात्मा को, उपासक जन (अव्याः वारैः) चित्तभूमि के विक्षेप का निवारण करनेवाले उपायों से और (अद्रिभिः) ध्यानरूप सिल-बट्टों से (परिहिन्वन्ति) अपने आत्मा में प्रेषित करते हैं अर्थात् उसका साक्षात्कार करते हैं ॥३॥

भावार्थ : योग के विघ्नरूप व्याधि, स्त्यान, संशय आदि तथा दुःख, दौर्मनस्य आदि का निवारण करके ध्यान द्वारा परमात्मा का साक्षात्कार करके सबको आनन्द-रस की धारा में स्नान करना चाहिए ॥३॥