Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1213

अपघ्नन्पवते मृधोऽप सोमो अराव्णः। गच्छन्निन्द्रस्य निष्कृतम्॥१२१३

Veda : Samveda | Mantra No : 1213

In Hindi:

ऋषि : अहमीयुरांगिरसः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ५१० क्रमाङ्क पर परमात्मा के पक्ष में की जा चुकी है। यहाँ वीररस का विषय दर्शाते हैं।

पदपाठ : अपघ्नन् ।अप। घ्नन् ।पवते। मृधः ।अप ।सोमः ।अराव्णः ।अ। राव्णः ।गच्छन् ।इन्द्रस्य ।निष्कृतम्। निः ।कृतम्॥

पदार्थ : (सोमः) जगाया हुआ वीर रस (इन्द्रस्य) जीवात्मा के (निष्कृतम्) संस्कृत किये हुए मनरूप घर में (गच्छन्) जाता हुआ, (मृधः) सङ्ग्रामकारियों को (अपघ्नन्) हिंसित करता हुआ और (अराव्णः) अदानशील कृपण शत्रुओं को (अप) विनष्ट करता हुआ (पवते) प्रवाहित होता है ॥१॥

भावार्थ : वीर रस में डूबा हुआ मानव सब आन्तरिक तथा बाह्य शत्रुओं को विनष्ट कर सकता है ॥१॥