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Samveda/1228

धर्त्ता दिवः पवते कृत्व्यो रसो दक्षो देवानामनुमाद्यो नृभिः। हरिः सृजानो अत्यो न सत्वभिर्वृथा पाजासि कृणुषे नदीष्वा॥१२२८

Veda : Samveda | Mantra No : 1228

In Hindi:

ऋषि : कविर्भार्गवः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ५५८ क्रमाङ्क पर परमात्मा के विषय में की जा चुकी है। यहाँ पुनः उसी विषय को दर्शाते हैं।

पदपाठ : धर्ता। दिवः ।पवते ।कृत्व्यः ।रसः ।दक्षः ।देवानाम् ।अनुमाद्यः ।अनु ।माद्यः ।नृभिः ।हरिः ।सृजानः। अत्यः ।न ।सत्वभिः ।बृथा ।पाजासि। कृणुषे। नदीषु। आ ॥

पदार्थ : (दिवः) कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य के प्रकाश का (धर्ता) दाता, (कृत्व्यः) कर्मपरायण, (रसः) रसीला, (देवानाम्) प्रकाशक सूर्य, चन्द्र, अग्नि, विद्युत्, नक्षत्र आदियों को (दक्षः) बल देनेवाला, (नृभिः) मनुष्यों से (अनुमाद्यः) आराधनीय सोम परमेश्वर (पवते) सब जड़-चेतनरूप जगत् को पवित्र करता है। आगे प्रत्यक्षवत् वर्णन है—(हरिः) समुद्र में स्थित जलों को सूर्यकिरणों द्वारा हरकर आकाश में ले जानेवाले आप, हे परमात्मन् ! (सत्त्वभिः) अपने बलों द्वारा (सृजानः) बादलों से वर्षा करते हुए (नदीषु) नदियों में (वृथा) अनायास ही (पाजांसि) वेगों को (कृणुषे) उत्पन्न करते हो, (सृजानः अत्यः न) जैसे जोड़ा जाता हुआ घोड़ा रथ आदि में वेगों को उत्पन्न करता है ॥१॥यहाँ श्लिष्टोपमा अलङ्कार है ॥१॥

भावार्थ : जड़-चेतनरूप जगत् में जो कुछ भी बल, वेग, विवेक प्रकाश आदि है, वह सब परमात्मा से ही उत्पन्न हुआ है ॥१॥