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Samveda/1234

त हि स्वराजं वृषभं तमोजसा धिषणे निष्टतक्षतुः। उतोपमानां प्रथमो नि षीदसि सोमकाम हि ते मनः (ची)।।॥१२३४

Veda : Samveda | Mantra No : 1234

In Hindi:

ऋषि : भर्गः प्रागाथः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : बार्हतः प्रगाथः | स्वर : पञ्चमः

विषय : अगले मन्त्र में पुनः आचार्य का विषय है।

पदपाठ : तम्। हि ।स्वराजम्। स्व ।राजम् ।वृषभम्। तम् ।ओजसा। धिषणेइति ।निष्टतक्षतुः ।निः ।ततक्षतुः ।उत ।उपमानाम् ।उप ।मानाम्। प्रथमः ।नि ।सीदसि। सोमकामम्। सोम ।कामम्। हि ।ते। मनः॥

पदार्थ : (तं हि स्वराजम्) विद्या के सूर्य उस आचार्य को, (तं वृषभम्) विद्या के वर्षक उस आचार्य को (धिषणे) विद्या तथा वाणी ने (निष्टतक्षतुः) संस्कृत किया हुआ है। अब प्रत्यक्षरूप में कहते हैं—(उत) और, हे आचार्यवर ! आप (उपमानाम्) उपमानों के मध्य (प्रथमः) श्रेष्ठ होकर (निषीदसि) स्थित हो। (ते मनः) आपका मन (सोमकामं हि) ज्ञानरस के प्रदान का इच्छुक है ॥२॥

भावार्थ : वही आचार्य श्रेष्ठ है, जिसका विद्या-वैभव और वाणी-वैभव दोनों ही उत्कृष्ट हों ॥२॥इस खण्ड में परमात्मा, आचार्य, उपासनायज्ञ, आनन्दरस और प्रसङ्गतः राजा का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥नवम अध्याय में सप्तम खण्ड समाप्त ॥