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Samveda/1249

त्व हि शश्वतीनामिन्द्र धर्त्ता पुरामसि। हन्ता दस्योर्मनोर्वृधः पतिर्दिवः (फे)।। [धा. । उ । स्व. ।]॥१२४९

Veda : Samveda | Mantra No : 1249

In Hindi:

ऋषि : नृमेध आङ्गिरसः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : अगले मन्त्र में परमेश्वर और राजा के वीरकर्मों का वर्णन करते हैं।

पदपाठ : त्वम् ।हि। शश्वतीनाम्। इन्द्र। दर्ता। पुराम् ।असि ।हन्ता। दस्वोः। मनोः ।वृधः। पतिः ।दिवः॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) परमवीर जगदीश्वर वा राजन् ! (त्वं हि) आप निश्चय ही (शश्वतीनाम्) बहुत सी (पुराम्) शत्रु-नगरियों के (धर्ता) भेदन करनेवाले, (दस्योः) हिंसक शत्रु के (हन्ता) विनाशक, (मनोः) मननशील शान्तिप्रिय मनुष्य के (वृधः) बढ़ानेवाले और (दिवः) तेजस्वी जन के (पतिः) रक्षक (असि) हो ॥३॥

भावार्थ : जैसे जगदीश्वर दुष्टों का भञ्जक और सज्जनों का रक्षक होता है, वैसे ही राजा को भी होना चाहिए ॥३॥