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Samveda/1257

एष विप्रैरभिष्टुतोऽपो देवो वि गाहते। दधद्रत्नानि दाशुषे॥१२५७

Veda : Samveda | Mantra No : 1257

In Hindi:

ऋषि : शुनः शेप आजीगर्तिः स देवरातः कृत्रिमो वैश्वामित्रः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में परमात्मा द्वारा कर्मफल दिये जाने का वर्णन है।

पदपाठ : एषः ।विप्रैः ।वि ।प्रैः ।अभिष्टुतः ।अभि ।स्तुतः ।अपः ।देवः ।वि ।गाहते ।दधत् ।रत्नानि ।दाशुषे॥

पदार्थ : (विप्रैः) विद्वान् उपासकों से (अभिष्टुतः) अभिमुख होकर स्तुति किया गया (एषः) यह (देवः) कर्मफलप्रदाता परमेश्वर (अपः) मनुष्यों से किये गये कर्मों का (विगाहते) आलोडन अर्थात् निरीक्षण करता है और (दाशुषे) आत्मसमर्पणकर्ता शुभकर्मकारी मनुष्य को (रत्नानि) रमणीय फल (दधत्) प्रदान करता है ॥२॥

भावार्थ : न्यायकारी परमेश्वर शुभकर्मों का शुभ फल और अशुभ कर्मों का अशुभ फल कर्म करनेवाले को देता है ॥२॥