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Samveda/1266

एष धिया यात्यण्व्या शूरो रथेभिराशुभिः। गच्छन्निन्द्रस्य निष्कृतम्॥१२६६

Veda : Samveda | Mantra No : 1266

In Hindi:

ऋषि : असितः काश्यपो देवलो वा | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : प्रथम मन्त्र में मुक्ति के विषय का वर्णन है।

पदपाठ : एषः ।धिया ।याति। अण्व्या ।शूरः। रथेभिः ।आशुभिः ।गच्छन् ।इन्द्रस्य ।निष्कृतम् ।निः ।कृतम्॥

पदार्थ : (इन्द्रस्य) परमेश्वर के (निष्कृतम्) परम धाम को (गच्छन्) जाता हुआ (एषः) यह सोम जीवात्मा (अण्व्या) सूक्ष्म (धिया) ऋतम्भरा प्रज्ञा द्वारा (याति) लक्ष्य को पा लेता है, जैसे (शूरः) कोई शूर मनुष्य (आशुभिः) वेगवान् (रथैः) रथों द्वारा लक्ष्य को पाता है ॥१॥यहाँ लुप्तोपमालङ्कार है ॥१॥

भावार्थ : मुक्ति की प्राप्ति में ऋतम्भरा प्रज्ञा परम सहायक होती है ॥१॥