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Samveda/1274

एष उ स्य वृषा रथोऽव्या वारेभिरव्यत। गच्छन्वाज सहस्रिणम्॥१२७४

Veda : Samveda | Mantra No : 1274

In Hindi:

ऋषि : राहूगण आङ्गिरसः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : प्रथम मन्त्र में जीवात्मा का विषय वर्णित किया गया है।

पदपाठ : एषः। उ ।स्यः ।वृषा ।रथः ।अव्याः ।वारेभिः ।अव्यत ।गच्छन् ।वाजम् ।सहस्रिणम्॥

पदार्थ : (सहस्रिणम्) सहस्र ऐश्वर्यों से युक्त (वाजम्) बल को (गच्छन्) प्राप्त करता हुआ (एषः उ) यह (स्यः) वह (वृषा) सुखवर्षी (रथः) गतिशील सोम जीवात्मा (अव्याः वारेभिः) रक्षा करनेवाली जगन्माता के दोष-निवारक उपायों से (अव्यत) रक्षा किया जाता है ॥१॥

भावार्थ : जगन्माता की उपासना से मनुष्य के दोष दूर होते हैं और उसमें सद्गुण समा जाते हैं ॥१॥