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Samveda/1283

एष वृषा कनिक्रदद्दशभिर्जामिभिर्यतः। अभि द्रोणानि धावति॥१२८३

Veda : Samveda | Mantra No : 1283

In Hindi:

ऋषि : प्रियमेधः आङ्गिरसः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में जीवात्मा का कर्तव्य वर्णित है।

पदपाठ : एषः। वृषा ।कनिक्रदत् ।दशभिः ।जामिभिः ।यवः ।अभि ।द्रोणानि ।धावति॥

पदार्थ : (वृषा) बलवान् और (दशभिः जामिभिः) दस अंगुलियों से अर्थात् अंगुलियों के समान आपस में सम्बद्ध दस यम-नियमों से (यतः) नियन्त्रित हुआ (एषः) यह सोम जीवात्मा (द्रोणानि अभि) सांसारिक भोगों के प्रति (धावति) दौड़े ॥४॥

भावार्थ : सांसारिक भोगों में अति आसक्ति उचित नहीं है ॥४॥