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Samveda/1304

अगन्म महा नमसा यविष्ठं यो दीदाय समिद्धः स्वे दुरोणे। चित्रभानु रोदसी अन्तरुर्वी स्वाहुतं विश्वतः प्रत्यञ्चम्॥१३०४

Veda : Samveda | Mantra No : 1304

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठो मैत्रावरुणिः | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : प्रथम मन्त्र में परमात्मा की प्राप्ति का विषय वर्णित है।

पदपाठ : अगन्म । महा । नमसा । यविष्ठम् । यः । दीदाय । समिद्ध । सम् । इद्धः । स्वे । दुरोणे । दुः । ओने । चित्रभानुम् । चित्र । भानुम् । रोदसीइति । अन्तः । उर्वीइति । स्वाहुतम् । सु । आहुतम् । विश्वत । प्रत्यञ्चम् । प्रति । अञ्चम्॥

पदार्थ : (यः) जो अग्रनेता परमेश्वर (स्वे) अपने (दुरोणे) ब्रह्माण्डरूप और जीवात्मारूप घर में (समिद्धः) प्रदीप्त हुआ (दीदाय) भासित होता है, उस (यविष्ठम्) सर्वाधिक युवा, (चित्रभानुम्) अद्भुत प्रकाशवाले, (उर्वी रोदसी) विस्तीर्ण द्यावापृथिवी के (अन्तः) अन्दर (स्वाहुतम्) जिसने अपनी आहुति दी हुई है, ऐसे (विश्वतः प्रत्यञ्चम्) सब जगह व्याप्त परमेश्वर को (महा नमसा) महान् नमस्कार के साथ, हम (अगन्म) प्राप्त होते हैं ॥१॥

भावार्थ : जो सूक्ष्मदर्शी लोग हैं, वे आकाश-पृथिवी में सर्वत्र परमात्मा की ही विभूति को देखते हैं ॥१॥