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Samveda/1314

नूनं पुनानोऽविभिः परि स्रवादब्धः सुरभिन्तरः। सुते चित्वाप्सु मदामो अन्धसा श्रीणन्तो गोभिरुत्तरम्॥१३१४

Veda : Samveda | Mantra No : 1314

In Hindi:

ऋषि : सप्तर्षयः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) | स्वर : मध्यमः

विषय : अगले मन्त्र में परमात्मा को सम्बोधन किया गया है।

पदपाठ : नूनम् । पुनानः । अविभिः । परि । स्रव । अदब्ध । अ । दब्धः । सुरभिरन्तरः । सु । रभिरन्तरः । सुते । चित् । त्वा । अप्सु । मदामः । अन्धसा । श्रीणन्तः । गोभिः । उत्तरम्॥

पदार्थ : हे सोम ! हे रसनिधि परमात्मन् ! (नूनम्) निश्चय ही (अविभिः) अपनी रक्षाओं से (पुनानः) हमें पवित्र करते हुए, (अदब्धः) किसी से न हराये जा सकनेवाले, (सुरभिन्तरः) अतिशय सौरभमय आप (परि स्रव) आनन्द-रस को प्रवाहित करो। (अन्धसा) आनन्द-रस के साथ (अप्सु) हमारे कर्मों में (सुते चित्) आपके परिस्रुत होने पर (उत्तरम्) अत्यन्त उत्कृष्ट (त्वा) आपको (गोभिः) आत्मा, मन, एवं बुद्धि से (श्रीणन्तः) पकाते हुए अर्थात् ध्याते हुए, हम (मदामः) मुदित होते हैं ॥२॥

भावार्थ : परमात्मा में ध्यान से रक्षा, पवित्रता, सद्गुणों की सुगन्ध और परमानन्द प्राप्त होते हैं ॥२॥