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Samveda/1335

उपो षु जातमप्तुरं गोभिर्भङ्गं परिष्कृतम्। इन्दुं देवा अयासिषुः॥१३३५

Veda : Samveda | Mantra No : 1335

In Hindi:

ऋषि : अहमीयुरांगिरसः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ४८७ क्रमाङ्क पर परमात्मा की प्राप्ति के विषय में और उत्तरार्चिक में ७६२ क्रमाङ्क पर जीवात्मा तथा राजा के विषय में की जा चुकी है। यहाँ परमात्मा और चन्द्रमा का विषय वर्णित करते हैं।

पदपाठ : उष । उ । सु । जातम् । अप्तुरम् । गोभिः । भङ्गम् । परिष्कृतम् । परि । कृतम् । इन्दुम् । देवाः । अयासिषुः॥

पदार्थ : प्रथम—परमात्मा के पक्ष में। (सुजातम्) सुप्रसिद्ध, (अप्तुरम्) व्यापक चन्द्र, सूर्य, ग्रह, नक्षत्र आदि लोकों को वेग से चलानेवाले, (गोभिः) वेद-वाणियों से (भङ्गम्) काम, क्रोध आदि रिपुओं के भञ्जक, (परिष्कृतम्) गुणों से अलङ्कृत, (इन्दुम्) तेज से दीप्त वा आनन्द-रसों से भिगोनेवाले परमात्मा को (देवाः) विद्वान् लोग वा आत्मा, मन, बुद्धि, प्राण आदि बल की प्राप्ति के लिए (उप उ अयासिषुः) प्राप्त करते हैं ॥द्वितीय—चन्द्रमा के पक्ष में (सुजातम्) पृथिवी के सुपुत्र, (अप्तुरम्) अन्तरिक्ष में पृथिवी और सूर्य के चारों ओर दौड़नेवाले, (गोभिः भङ्गम्) कहीं भूमियों में दरार पड़े हुए और कहीं (परिष्कृतम्) परिष्कृत अर्थात् समतल (इन्दुम्) चन्द्रमा को (देवाः) सूर्य-किरणें (अयासिषुः) प्रकाशित करने के लिए प्राप्त करती हैं ॥१॥इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥१॥

भावार्थ : जैसे सब जड़ पदार्थ और चेतन प्राणी जगदीश्वर के आश्रय से रहते हैं, वैसे ही हमारे सौर लोक के मङ्गल, बुध, पृथिवी, चन्द्रमा आदि ग्रह-उपग्रह सूर्य के आश्रय से रहते हैं और सूर्य भी जगदीश्वर के अधीन है ॥१॥