Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1337

अर्षा नः सोम शं गवे धुक्षस्व पिप्युषीमिषम्। वर्धा समुद्रमुक्थ्य (ही)।।॥१३३७

Veda : Samveda | Mantra No : 1337

In Hindi:

ऋषि : अहमीयुरांगिरसः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में परमात्मा से प्रार्थना करते हैं।

पदपाठ : अर्ष । नः । सोम । शम् । गवे । धुक्षस्व । पिप्युषीम् । इषम् । वर्ध । समुद्रम् । सम् । उद्रम् । उक्थ्य॥

पदार्थ : हे (सोम) जगत् के रचयिता शान्तिप्रिय परमात्मन् ! आप (नः) हमारी (गवे) सारी धरती को (शम्) सुख-शान्ति (अर्ष) प्राप्त कराओ, हमें (पिप्युषीम्) समृद्ध (इषम्) अभीष्ट सम्पदा (धुक्ष्व) प्रदान करो। हे (उक्थ्य) स्तुतियोग्य ! (समुद्रम्) सद्गुणों के समुद्र जीवात्मा को अथवा उसमें विद्यमान आनन्द के समुद्र को (वर्ध) बढ़ाओ। जैसे सोम चन्द्रमा जलों के पारावार समुद्र को बढ़ाता है, यह यहाँ ध्वनित होता है ॥३॥

भावार्थ : रमात्मा की कृपा से और मनुष्यों के प्रयत्न से सारी धरती सुख, शान्ति तथा प्रचुर सम्पदा प्राप्त करे और उसके निवासी आपस में प्रेम का व्यवहार करें ॥३॥इस खण्ड में परत्मात्मा, ब्रह्मानन्द और गुरु-शिष्य के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥दशम अध्याय में एकादश खण्ड समाप्त ॥