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Samveda/1339

बृहन्निदिध्म एषां भूरि शस्त्रं पृथुः स्वरुः। येषामिन्द्रो युवा सखा॥१३३९

Veda : Samveda | Mantra No : 1339

In Hindi:

ऋषि : त्रिशोकः काण्वः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : आगे फिर वही विषय है।

पदपाठ : बृहन् । इत् । इध्मः । एषाम् । भूरि । शस्त्रम् । पृथुः । स्वरुः । येषाम् । इन्द्रः । युवा । सखा । स । खा॥

पदार्थ : (येषाम्) जिन मनुष्यों का (युवा) युवा (इन्द्रः) वीर परमेश्वर वा वीर राजा (सखा) सहायक हो जाता है, (एषाम्) उनका (बृहन् इत्) महान् ही (इध्मः) प्रताप, (भूरि) बहुत (शस्त्रम्) स्तोत्र वा शस्त्रास्त्र और (पृथुः) विशाल (स्वरुः) यज्ञ होता है ॥२॥

भावार्थ : परमेश्वर के उपासक तथा श्रेष्ठ राजा को राजसिंहासन पर बैठानेवाले लोग यशस्वी, विजयी यज्ञपरायण बन जाते हैं ॥२॥