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Samveda/1353

उत स्वराजो अदितिरदब्धस्य व्रतस्य ये। महो राजान ईशते (खि)।। [धा. । उ । स्व. ।]॥१३५३

Veda : Samveda | Mantra No : 1353

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठो मैत्रावरुणिः | देवता : आदित्यः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में जगन्माता अदिति और विद्वान् जनों का वर्णन है।

पदपाठ : उत । स्वराजः । स्व । राजः । अदितिः । अ । दितिः । अदब्धस्य । अ । दब्धस्य । व्रतस्य । ये । महः । राजानः । ईशते॥

पदार्थ : (उत) और (स्वराजः) स्वराज्यसम्पन्न उपासक विद्वान् जन तथा (अदितिः) अखण्डनीय जगन्माता, (ये) जो (अदब्धस्य) अटूट (व्रतस्य) संकल्प तथा कर्म के (राजानः) राजा हैं, वे (महः) महान् ऐश्वर्य के (ईशते) स्वामी होते हैं अर्थात् महान् ऐश्वर्य देने की क्षमता रखते हैं ॥३॥

भावार्थ : जो लोग परमात्मा की तथा चरित्रवान् विद्वानों की सङ्गति करते, हैं वे परमैश्वर्यवान् हो जाते हैं ॥३॥