Samveda/1355
पदा पणीनराधसो नि बाधस्व महा असि। न हि त्वा कश्च न प्रति॥१३५५
Veda : Samveda | Mantra No : 1355
In English:
Seer : pragaathaH kaaNvaH | Devta : indraH | Metre : gaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : padaa paNiinaraadhaso ni baadhasva mahaa.m asi . na hi tvaa kashcha na prati.1355
Component Words : padaa . paNiin . araadhasaH . a . raadhasaH . ni . baadhasva . mahaan . asi . na . hi . tvaa . kaH . cha . na . prati.
In Hindi:
ऋषि : प्रगाथः काण्वः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : आगे फिर जीवात्मा को उद्बोधन है।
पदपाठ : पदा । पणीन् । अराधसः । अ । राधसः । नि । बाधस्व । महान् । असि । न । हि । त्वा । कः । च । न । प्रति॥
पदार्थ : हे इन्द्र जीवात्मन् ! तू (अराधसः) दूसरों के कार्यों को सिद्ध न करनेवाले (पणीन्) स्वार्थभावों को (पदा) जैसे पैर की ठोकर मार कर किसी को दूर फेंक देते हैं, वैसे (नि बाधस्व) दूर फेंक दे, तू (महान्) महान् (असि) है, (त्वा) तुझे (कश्च न) कोई भी (प्रति नहि) प्रतिरुद्ध नहीं कर सकता है, अर्थात् तेरे मार्ग में रुकावट नहीं डाल सकता है ॥२॥यहाँ ‘पदा’ में लुप्तोपमालङ्कार है ॥२॥
भावार्थ : जैसे कोई पैर की ठोकर मार कर मार्ग की रुकावट को दूर फेंक देता है, वैसे ही जीवात्मा को चाहिए कि विघ्नरूप आन्तरिक शत्रुओं को दूर कर दे ॥२॥
In Sanskrit:
ऋषि : प्रगाथः काण्वः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : अथ पुनर्जीवात्मानमुद्बोधयति।
पदपाठ : पदा । पणीन् । अराधसः । अ । राधसः । नि । बाधस्व । महान् । असि । न । हि । त्वा । कः । च । न । प्रति॥
पदार्थ : हे इन्द्र जीवात्मन् ! त्वम् (अराधसः) परकार्याऽसाधकान् (पणीन्) स्वार्थभावान् (पदा) पादाघातेन इव (नि बाधस्व) दूरं प्रक्षिप, त्वम् (महान्) महिमोपेतः (असि) विद्यसे। (त्वा) त्वाम् (कश्चन) कोऽपि (प्रति नहि) प्रतिरोद्धुं न शक्नोति ॥२॥अत्र पदा पादेन इव इति लुप्तोपमालङ्कारः ॥२॥
भावार्थ : यथा कश्चित् पादाघातेन मार्गप्रतिबन्धकमपसारयति तथैव जीवात्मना विघ्नभूता आभ्यन्तराः शत्रवोऽपनेयाः ॥२॥
टिप्पणी:१. ऋ० ८।६४।२, अथ० २०।९३।२, उभयत्र ‘प॒णीँरराधसो॒’ इति पाठः।