Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1357

आ जागृविर्विप्र ऋतां मतीना सोमः पुनानो असदच्चमूषु। सपन्ति यं मिथुनासो निकामा अध्वर्यवो रथिरासः सुहस्ताः॥१३५७

Veda : Samveda | Mantra No : 1357

In Hindi:

ऋषि : पराशरः शाक्त्यः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : प्रथम मन्त्र में परमात्मा का विषय है।

पदपाठ : आ । जागृविः । विप्रः । वि । प्रः । ऋतम् । मतीनाम् । सोमः । पुनानः । असदत् । चमूषु । सपन्ति । यम् । मिथुनासः । निकामाः । नि । कामाः । अध्वर्यवः । रथिरासः । सुहस्ता । सु । हस्ता॥

पदार्थ : (जागृविः) जागरूक, (विप्रः) विशेषरूप से पूर्णता प्रदान करनेवाला, (मतीनाम्) बुद्धियों के (ऋतम्) व्यापार को (पुनानः) पवित्र करनेवाला, (सोमः) सत्कर्मों की प्रेरणा देनेवाला परमेश्वर (चमूषु) आत्मा, मन, प्राण आदि में वा सूर्य, चन्द्र, भूमण्डल आदि लोकों में (आ असदत्) नियामकरूप से स्थित है, (यम्) जिस परमेश्वर को (निकामाः) निरन्तर पाने की लौ लगाये हुए, (रथिरासः) उत्कृष्ट शरीर-रथवाले, (सुहस्ताः) सिद्धहस्त (अध्वर्यवः) उपासना-यज्ञ के इच्छुक (मिथुनासः) स्त्री-पुरुष (सपन्ति) प्राप्त कर लेते हैं ॥१॥

भावार्थ : शरीर और बाह्य जगत् का जो सञ्चालन करता है, उस जगदीश्वर की सबको भली-भाँति उपासना करनी चाहिए ॥१॥