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Samveda/1359

स वर्धिता वर्धनः पूयमानः सोमो मीढ्वा अभि नो ज्योतिषावित्। यत्र नः पूर्वे पितरः पदज्ञाः स्वर्विदो अभि गा अद्रिमिष्णन् (तै)।। [धा. । उ । स्व. ।]॥१३५९

Veda : Samveda | Mantra No : 1359

In Hindi:

ऋषि : पराशरः शाक्त्यः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अगले मन्त्र में उपासक अपनी कामना प्रकट कर रहा है।

पदपाठ : सः । वर्द्धिता । वर्द्धनः । पूयमानः । सोमः । मीढवान् । अभि । नः । ज्योतिषा । आवीत् । यत्र । नः । पूर्वे । पितरः । पदज्ञाः । पद । ज्ञाः । स्वर्विदः । स्वः । विदः । अभि । गाः । अद्रिम् । अ । द्रिम् । इष्णन्॥

पदार्थ : (वर्धिता) बढ़ानेवाला, (वर्धनः) स्वयं बढ़ा हुआ अर्थात् महिमा को प्राप्त, (पूयमानः) उपासकों से प्राप्त किया जाता हुआ, (मीढ़्वान्) सुख सींचनेवाला, (सोमः) जगत् का रचयिता परमेश्वर (ज्योतिषा) ज्योति के द्वारा (नः) हमारी (अभि आवीत्) रक्षा करे, (यत्र) जिसके आश्रय में विद्यमान (पदज्ञाः) मोक्षपद के ज्ञाता, (नः) हमारे (पूर्वे पितरः) श्रेष्ठ पितृजन (गाः अभि) दिव्य प्रकाश की किरणों को प्राप्त करने के लिए (अद्रिम्) पर्वत के समान रुकावट डालनेवाले तमोजाल को (इष्णन्) दूर कर देते हैं, तथा (स्वर्विदः) मोक्ष के आनन्द को प्राप्त करनेवाले हो जाते हैं ॥३॥

भावार्थ : ज्योतिर्मय परमात्मा की उपासना से मनुष्य भी ज्योतिष्मान् होकर मोक्ष पा लेते हैं ॥३॥