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Samveda/1378

त्रिशद्धाम वि राजति वाक्पतङ्गाय धीयते। प्रति वस्तोरह द्युभिः (छि)।।॥१३७८

Veda : Samveda | Mantra No : 1378

In Hindi:

ऋषि : सार्पराज्ञी | देवता : आत्मा सूर्यो वा | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : तृतीय ऋचा पूर्वार्चिक में ६३२ क्रमाङ्क पर सूर्य और परमात्मा के ही विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ प्राण का विषय वर्णित है।

पदपाठ : त्रिशत् । धाम । वि । राजति । वाक् । पतङ्गाय । धीयते । प्रति । वस्तीः । अह । द्युभिः॥

पदार्थ : यह प्राण (त्रिंशद् धाम) दिन-रात के तीसों मुहूर्तों में (वि राजति) शरीर में विराजमान रहता है अर्थात् जाग्रत् अवस्था, स्वप्न अवस्था और सुषुप्त अवस्था तीनों में सक्रिय रहता है, जैसा कि श्रुति है-‘प्राण अन्य सबके सो जाने पर भी खड़ा जागता रहता है’ (अथ० ११।४।२५)। इस (पतङ्गाय) श्वास-उच्छ्वास की गति से पक्षी के समान चेष्टा करनेवाले प्राण के लिए, अर्थात् प्राणयाम के काल में (वाक्) वाणी (धीयते) रोक ली जाती है, क्योंकि प्राणायाम करते हुए भाषण सम्भव नहीं है। (प्रति वस्तोः) प्रतिदिन (अह) निश्चय ही (द्युभिः) दीप्त-सूर्य-किरणों से यह प्राण बलवान् होता है ॥३॥

भावार्थ : दिन-रात शरीर को धारण करता हुआ यह प्राण प्राणियों का महान् उपकार करता है ॥३॥इस खण्ड में परमात्मोपासना, जीवात्मा, प्राण और प्रसङ्गतः विद्युत् का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ग्यारहवें अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त॥षष्ठ प्रपाठक में प्रथम अर्ध समाप्त ॥