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Samveda/1388

स वीरो दक्षसाधनो वि यस्तस्तम्भ रोदसी। हरिः पवित्रे अव्यत वेधा न योनिमासदम् (खै)।। [धा. । उ । स्व. ।]॥१३८८

Veda : Samveda | Mantra No : 1388

In Hindi:

ऋषि : प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : अगले मन्त्र में परमेश्वर का महत्त्व वर्णित है ॥

पदपाठ : सः । वीरः । दक्षसाधनः । दक्ष । साधनः । वि । यः । तस्तम्भ । रोदसीइति । हरिः । पवित्रे । अव्यत । वेधाः । न । योनिम् । आसदम् । आ । सदम्॥

पदार्थ : (सः) वह (वीरः) काम, क्रोध आदि शत्रुओं को कम्पायमान करनेवाला वीर सोम परमेश्वर (दक्षसाधनः) बल का साधक है, (यः) जो (रोदसी) द्युलोक और भूलोक को (तस्तम्भ) थामे हुए है। (वेधाः न) सूर्य के समान वह (हरिः) पापहर्ता परमेश्वर (योनिम्) आत्मा-रूप घर में (आसदम्) बैठने के लिए (पवित्रे) पवित्र अन्तःकरण में (अव्यत) आता है ॥३॥यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥

भावार्थ : जो बलवान् जगदीश्वर सब संसार को धारण करता है, उसकी उपासना से सीमित शक्तिवाला भी मनुष्य महान् शक्तिवाला और शत्रुओं को हराने में समर्थ हो जाता है ॥३॥