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Samveda/1391

आ त्वा सहस्रमा शतं युक्ता रथे हिरण्यये। ब्रह्मयुजो हरय इन्द्र केशिनो वहन्तु सोमपीतये॥१३९१

Veda : Samveda | Mantra No : 1391

In Hindi:

ऋषि : मेधातिथि-मेध्यातिथि काण्वौ | देवता : इन्द्रः | छन्द : बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में २४५ क्रमाङ्क पर अध्यात्म और अधिराष्ट्र रूप में की जा चुकी है। यहाँ सूर्य के वर्णन द्वारा परमात्मा की महिमा प्रकाशित करते हैं।

पदपाठ : आ । त्वा । सहस्रम् । आ । शतम् । युक्ताः । रथे । हिरण्यये । ब्रह्मयुजः । ब्रह्म । युजः । हरयः । इन्द्र । केशिनः । वहन्तु । सोमपीतये । सोम । पीतये॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) जगदीश्वर ! (हिरण्यये) ज्योतिर्मय (रथे) वेगवान् सूर्यमण्डल में (युक्ताः) नियुक्त, (ब्रह्मयुजः) बड़े-बड़े ग्रह-उपग्रहों से जुड़नेवाली, (केशिनः) प्रकाशमान और प्रकाशक (सहस्रम्) हजार (हरयः) किरणें (सोमपीतये) परमानन्द-रस के पानके लिए (त्वा) तुझ जगदीश्वर को (आवहन्तु) हमारे समीप लाएँ, (शतं सहस्रम्) सौ हजार किरणें तुझे हमारे समीप लाएँ। सूर्य और सूर्य की किरणें दर्शकों के सामने परमात्मा की ही महिमा को प्रकाशित करती हैं, इस अभिप्राय से यह कहा गया है ॥१॥

भावार्थ : अग्नि, वायु, सूर्य, तारे, बादल, नदी, समुद्र आदियों में विद्यमान विभूति को देखकर उनके निर्माता जगदीश्वर में श्रद्धा करके विद्वान् लोग उसकी उपासना से परम आनन्द का अनुभव करते हैं ॥१॥