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Samveda/1396

अग्निर्वृत्राणि जङ्घनद्द्रविणस्युर्विपन्यया। समिद्धः शुक्र आहुतः॥१३९६

Veda : Samveda | Mantra No : 1396

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ४ क्रमाङ्क पर परमात्मा के विषय में की गयी थी। यहाँ आचार्य का विषय कहते हैं।

पदपाठ : अग्निः । वृत्राणि । जङ्घनत् । द्रविणस्युः । विपन्यया । समिद्धः । सम् । इद्धः । शुक्रः । आहुतः॥

पदार्थ : (विपन्यया) शिष्यों के विनय-व्यवहार से (समिद्धः) प्रोत्साहित, (शुक्रः) पवित्र हृदयवाला, (आहुतः) शिष्यों से आत्मसमर्पण किया हुआ (अग्निः) विद्या से प्रकाशित आचार्य (द्रविणस्युः) शिष्यों को विद्याधन देने का इच्छुक होता हुआ, उनके (वृत्राणि) दोषों को (जङ्घनत्) अतिशयरूप से नष्ट करे ॥१॥

भावार्थ : गुरुओं का यह कर्तव्य है कि वे विद्या देने के साथ-साथ शिष्यों को भी दूर करें ॥१॥