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Samveda/1406

अग्निर्जुषत नो गिरो होता यो मानुषेष्वा। स यक्षद्दैव्यं जनम्॥१४०६

Veda : Samveda | Mantra No : 1406

In Hindi:

ऋषि : सुतंभर आत्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में यह कथन है कि परमेश्वर हमारे लिए क्या करे।

पदपाठ : अग्निः । जुषत । नः । गिरः । होता । यः । मानुषेषु । आ । सः । यक्षत् । दैव्यम् । जनम्॥

पदार्थ : (अग्निः) अग्रनायक परमेश्वर (नः) हमारी (गिरः) स्तुति वा प्रार्थना की वाणियों को (जुषत) स्वीकार करे, (यः) जो परमेश्वर (मानुषेषु) मनुष्यों में (होता) उनके जीवन-यज्ञ का होता बनकर (आ) निवास कर रहा है। (सः) वह (दैव्यम्) दिव्यगुणों में निष्णात (जनम्) विद्वान् जन को (यक्षत्) हमें प्रदान करे ॥२॥

भावार्थ : जिस राष्ट्र में दिव्य गुणों से युक्त विद्वान् मनुष्य होते हैं, वह राष्ट्र अत्यन्त उन्नत होता है ॥२॥