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Samveda/1413

यजिष्ठं त्वा ववृमहे देवं देवत्रा होतारममर्त्यम्। अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम्॥१४१३

Veda : Samveda | Mantra No : 1413

In Hindi:

ऋषि : सौभरि: काण्व: | देवता : अग्निः | छन्द : काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुप्, समा सतोबृहती) | स्वर : ऋषभः

विषय : प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ११२ क्रमाङ्क पर परमात्मा और राजा के विषय में की गयी थी। यहाँ आचार्य का विषय वर्णित करते हैं।

पदपाठ : यजिष्ठम् । त्वा । ववृमहे । देवम् । देवत्रा । होतारम् । अमर्त्यम् । अ । मर्त्यम् । अस्य । यज्ञस्य । सुक्रतुम् । सु । क्रतुम्॥

पदार्थ : हे अग्नि अर्थात् तेजस्वी विद्वन् ! (यजिष्ठम्) अतिशय परमेश्वरपूजक वा पञ्चमहायज्ञों को करनेवाले, (देवत्रा देवम्) ज्ञान के प्रकाशक विद्वानों में भी विशिष्ट विद्वान् (होतारम्) सुख-प्रदाता, (अमर्त्यम्) यशःशरीर से अमर, (अस्य यज्ञस्य) इस विद्या-यज्ञ के (सुक्रतुम्) सुकर्ता (त्वा) आपको, हम विद्यार्थी (ववृमहे) आचार्यरूप में वरण करते हैं ॥१॥

भावार्थ : आस्तिक, याज्ञिक, चरित्रवान्, शिक्षण-कला में कुशल विद्वान् मनुष्य को ही पढ़ाने के काम में लगाना चाहिए ॥१॥