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Samveda/1421

पिबा सुतस्य रसिनो मत्स्वा न इन्द्र गोमतः। आपिर्नो बोधि सधमाद्ये वृधेऽ. ऽस्मा अवन्तु ते धियः॥१४२१

Veda : Samveda | Mantra No : 1421

In Hindi:

ऋषि : मेध्यातिथिः काण्वः | देवता : इन्द्रः | छन्द : प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) | स्वर : मध्यमः

विषय : प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में २३९ क्रमाङ्क पर परमात्मा और राजा के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ परमेश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं।

पदपाठ : पिब । सुतस्य । रसिनः । मत्स्व । नः । इन्द्र । गोमतः । आपिः । नः । बोधि । सधमाद्ये । सध । माद्ये । वृधे । अस्मान । अवन्तु । ते । धियः॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) विघ्नों के विनाशक सर्वान्तर्यामी जगदीश्वर ! आप (रसिनः) रसीले (सुतस्य) प्रकट हुए मेरे प्रेमरस का (पिब) पान करो, (गोमतः) गाय आदि के ऐश्वर्यों से युक्त (नः) हम लोगों को (मत्स्व) आनन्दित करो। (सधमादे) सहयात्रा में (वृधे) बढ़ाने के लिए (आपिः) बन्धु बने हुए आप (नः) हमें (बोधि) बोध दो। (ते) आपके (धियः) प्रज्ञा और कर्म(अस्मान्) हम उपासकों की (अवन्तु) रक्षा करें ॥१॥

भावार्थ : यदि हम परमात्मा से स्नेह करते हैं तो वह भी हमसे स्नेह करता है और सद्बुद्धि, सत्कर्म आदि देकर हमारा उपकार करता है ॥१॥