Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1490

आ हरयः ससृज्रिरेऽरुषीरधि बर्हिषि। यत्राभि संनवामहे॥१४९०

Veda : Samveda | Mantra No : 1490

In Hindi:

ऋषि : प्रियमेधः आङ्गिरसः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में जीवात्मा के अधिष्ठान देह का वर्णन है।

पदपाठ : आ । हरयः । ससृज्रिरे । अरुषीः । अधि । बर्हिषि । यत्र । अभि । सन्नवामहे । सम् । नवामहे॥

पदार्थ : (बर्हिषि अधि) यज्ञरूप इस देह में (अरुषीः) यज्ञ को न हिंसित करनेवाले (हरयः) मन और प्राणसहित ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय रूप घोड़े (आ ससृज्रिरे) आकर जुड़े हुए हैं,(यत्र) जिस देह-यज्ञ में स्थित इन्द्र जीवात्मा को, हम (अभि संनवामहे) संस्तुत करते हैं, उद्बोधन देते हैं ॥२॥

भावार्थ : जो लोग शरीर को यज्ञस्थल, उसमें स्थित इन्द्रियों को ऋत्विज् और जीवात्मा को यजमान मानकर पवित्र जीवन बिताते हैं, वे सफल होते हैं ॥२॥