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Samveda/1514

त होतारमध्वरस्य प्रचेतसं वह्निं देवा अकृण्वत। दधाति रत्नं विधते सुवीर्यमग्निर्जनाय दाशुषे (लि)।। [धा. । उ नास्ति । स्व. ।]॥१५१४

Veda : Samveda | Mantra No : 1514

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठो मैत्रावरुणिः | देवता : अग्निः | छन्द : प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) | स्वर : पञ्चमः

विषय : अगले मन्त्र में फिर अग्निहोत्र का विषय वर्णित है।

पदपाठ : तम् । होतारम् । अधवरस्य । प्रचेतसम् । प्र । चेतसम् । वह्निम् । देवाः । अकृण्वत । दधाति । रत्नम् । विधते । सुवीर्यम् । सु । वीर्यम् । अग्निः । जनाय । दाशुषे॥

पदार्थ : (प्रचेतसम्) चेतानेवाले (वह्निम्) अग्नि को (देवाः) विद्वान् अग्निहोत्री लोग (अध्वरस्य) हिंसारहित यज्ञ का (होतारम्) निष्पादक (अकृण्वत) करते हैं। वह (अग्निः) यज्ञाग्नि (विधते) परमेश्वर-पूजक, (दाशुषे जनाय) हवि देनेवाले अग्निहोत्री को (सुवीर्यम्) सुवीर्य से युक्त (रत्नम्) आरोग्य आदि रत्न (दधाति) प्रदान करता है ॥२॥

भावार्थ : यज्ञाग्नि में रोग हरनेवाले सुगन्धित द्रव्यों की जो आहुति दी जाती है, वह अग्नि-ज्वालाओं द्वारा विच्छिन्न और सूक्ष्म की जाकर वायु के माध्यम से इधर-उधर फैलकर श्वास द्वारा प्राणियों के फेफड़ों में पहुँच कर वहाँ रक्तवाहिनी पतली-पतली केशिकाओं में खून से सम्बद्ध होकर खून में औषध को प्रविष्ट करा देती है और खून की मलिनता को हरकर साँस से बाहर निकाल देती है। इस प्रकार प्राणियों को स्वास्थ्य देती है। अग्निज्वालाओं की दीप्ति, उर्ध्वगति, दोष-दाहकता इत्यादि गुणों को देखकर यज्ञकर्ता अपने अन्दर भी इन गुणों को धारण करने का यत्न करता है। इस प्रकार अग्निहोत्र से बाह्य तथा आन्तरिक दोनों प्रकार के लाभ होते हैं ॥२॥