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Samveda/1526

आ नो अग्ने सुचेतुना रयिं विश्वायुपोषसम्। मार्डीकं धेहि जीवसे (वौ)।। [धा. । उ नास्ति । स्व. नास्ति ।]॥१५२६

Veda : Samveda | Mantra No : 1526

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : आगे फिर वही विषयहै।

पदपाठ : आ । नः । अग्ने । सुचेतुना । सु । चेतुना । रयिम् । विश्वायुपोषम् । विश्वायु । पोषसम् । मार्डीकम् । धेहि । जीवसे॥

पदार्थ : हे (अग्ने) अग्रनायक जगदीश्वर ! आप (नः जीवसे) हमारे जीवन के लिए (सुचेतुना) शुभ ज्ञान के साथ (विश्वायुपोषसम्) सब मनुष्यों के पोषक, (मार्डीकम्) सुखदायक (रयिम्) ऐश्वर्य को (आधेहि) प्रदान करो ॥३॥

भावार्थ : वह ज्ञान ज्ञान नहीं है और वह धन धन नहीं है, जो दूसरों के उपकार के लिए न हो ॥३॥