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Samveda/1529

आग्ने स्थूर रयिं भर पृथुं गोमन्तमश्विनम्। अङ्धि खं वर्तया पविम्॥१५२९

Veda : Samveda | Mantra No : 1529

In Hindi:

ऋषि : केतुराग्नेयः | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : आगे पुनः परमेश्वर और राजा से प्रार्थना है।

पदपाठ : आ । अग्ने । स्थूरम् । रयिम् । भर । पृथुम् । गोमन्तम् । अश्विनम् । अङ्धि । खम् । वर्तय । पविम्॥

पदार्थ : हे (अग्ने) अग्रनायक जगदीश्वर वा राजन् ! आप (गोमन्तम्) अन्तःप्रकाश से युक्त अथवा धेनु, पृथिवी आदि से युक्त, (अश्विनम्) प्राण-सम्पदा से युक्त अथवा श्रेष्ठ घोड़ों से युक्त, (पृथुम्) अति विशाल, (स्थूरम्) अति स्थिर, (रयिम्) ऐश्वर्य (आभर) प्रदान करो। (खम्) ह्रदयाकाश को वा राष्ट्र के आकाश को (अङ्धि) तामसिकता हटाकर निर्मल कर दो। अन्तःशत्रुओं बाह्य शत्रुओं के विध्वंस के लिए (पविम्) पवित्रता का वा शस्त्रास्त्रों का (वर्तय) प्रयोग करो ॥३॥

भावार्थ : जैसे जगदीश्वर आन्तरिक विघ्नों वा शत्रुओं को विनष्ट करके अन्तरात्मा को पवित्र करता है, वैसे ही राष्ट्र का राजा बाह्य उपद्रवकारियों को नष्ट करके राष्ट्र को निष्कण्टक करे ॥३॥