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Samveda/1542

उप त्वा जुह्वोऽ. मम घृताचीर्यन्तु हर्यत। अग्ने हव्या जुषस्व नः॥१५४२

Veda : Samveda | Mantra No : 1542

In Hindi:

ऋषि : विरूप आङ्गिरसः | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में परमात्मा को हवि अर्पित करते हैं।

पदपाठ : उप । त्वा । जुह्व । मम् । घृताचीः । यन्तु । हर्यत । अग्ने । हव्या । जुषस्व । नः॥

पदार्थ : हे (अग्ने) ज्योतिर्मय परमेश ! हे (हर्यत) कमनीय ! (मम) मुझ स्तोता की (घृताचीः) स्नेह से आर्द्र वा तेज से युक्त (जुह्वः) वाणियाँ (त्वा) आपको (उप यन्तु) प्राप्त हों। आप (नः) हमारी (हव्या) आत्मसमर्पणरूप हवियों को (जुषस्व) प्रेम से स्वीकार करो ॥२॥

भावार्थ : श्रद्धा और प्रेम से की गयी परमात्मा की स्तुति अवश्य फलदायक होती है ॥२॥