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Samveda/1547

कृष्णां यदेनीमभि वर्पसाभूज्जनयन्योषां बृहतः पितुर्जाम्। ऊर्ध्वं भानु सूर्यस्य स्तभायन् दिवो वसुभिररतिर्वि भाति॥१५४७

Veda : Samveda | Mantra No : 1547

In Hindi:

ऋषि : त्रित आप्तयः | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : आगे फिर परमात्मा के कर्तृत्व का वर्णन है।

पदपाठ : कृष्णाम् । यत् । एनीम् । अभि । वर्पसा । भूत् । जनयत् । योषाम् । बृहतः । पितुः । जाम् । ऊर्ध्वम् । भानुम् । सूर्यस्य । स्तभायन् । दिवः । वसुभिः । अरतिः । वि । भाति॥

पदार्थ : (यत्) जब (बृहतः पितुः) महान् पालनकर्ता सूर्य की (जाम्) पुत्री (योषाम्) उषा को (जनयन्) उत्पन्न करना चाहता हुआ अग्नि परमेश्वर (एनीम्) व्याप्त (कृष्णाम्) काली रात्रि को (वर्पसा) सूर्य के रूप से (अभिभूत्) तिरस्कृत करता है, तब (सूर्यस्य) सूर्य के (उर्ध्वम्) ऊपर स्थित (भानुम्) प्रकाश-मण्डल को (स्तभायन्) थामे हुए (अरतिः) सबका स्वामी वह परमेश्वर (दिवः) द्युलोक के (वसुभिः) ग्रह, नक्षत्र आदि लोकों से (विभाति) विशेष रूप से शोभित होता है ॥१॥

भावार्थ : भूमि पर और आकाश में व्याप्त काली रात्रि को छिन्न-भिन्न करके चमकीली उषा को और उसके अनन्तर तीव्र प्रकाशवाले सूर्य को उत्पन्न करता हुआ जगदीश्वर महिमा से अत्यधिक शोभा पाता है ॥२॥