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Samveda/1559

भद्रो नो अग्निराहुतो भद्रा रातिः सुभग भद्रो अध्वरः। भद्रा ऊत प्रशस्तयः॥१५५९

Veda : Samveda | Mantra No : 1559

In Hindi:

ऋषि : सौभरि: काण्व: | देवता : अग्निः | छन्द : काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुप्, समा सतोबृहती) | स्वर : ऋषभः

विषय : प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में १११ क्रमाङ्क पर यज्ञाग्नि, अतिथि और परमात्मा के विषय में की जा चुकी है। यहाँ राष्ट्र-विषयक भद्र की प्रार्थना है।

पदपाठ : भद्रः । नः । अग्निः । आहुतः । आ । हुतः । भद्रा । रातिः । सुभग । सु । भग । भद्रः । अध्वरः । भद्राः । उत । प्रशस्तयः । प्र । शस्तयः॥

पदार्थ : (आहुतः) जिसमें आहुति डाली गयी है, ऐसी (अग्निः) राष्ट्रियता की अग्नि (नः) हमारे लिए (भद्रः) शुभ हो। (रातिः) राष्ट्र के लिए की गयी दान की क्रिया (भद्रा) शुभ हो। हे (सुभग) सौभाग्यवान् राजन् ! (अध्वरः) तुम्हारे और हमारे द्वारा किया गया राष्ट्र-यज्ञ (भद्रः) शुभ हो। (उत) और (प्रशस्तयः) राष्ट्र की उन्नति से प्राप्त प्रशस्तियाँ (भद्राः) शुभ हों ॥१॥

भावार्थ : सब प्रजाजन और राजा, मन्त्री आदि राज्याधिकारी राष्ट्रभक्त होकर मातृभूमि के लिए अपना बलिदान भी करने के लिए सदा तैयार रहें ॥१॥